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Thursday, October 17, 2019

भुखमरी की स्थिति में कोई सुधार नहीं, भारत 102 स्थान पर; पाकिस्तान, बांग्लादेश और श्रीलंका से भी पीछे

नई दिल्ली. वैश्विक भूख सूचकांक (जीएचआई) ने भुखमरी से जूझ रहे 117 देशों की रिपोर्ट मंगलवार को जारी की। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 2014 के बाद स्थिति में ज्यादा सुधार नहीं आया है। इस लिस्ट में भारत 102वें नंबर पर है। जबकि पड़ोसी देश पाकिस्तान (94वें), बांग्लादेश (88वें), नेपाल (73वें) और श्रीलंका (66वें) भारत से बेहतर स्थित मेंहैं।

  1. जीएचआई की 2014 में जारी रिपोर्ट में भारत 76 देशों की लिस्ट में 55वें और 2017 में 119 में से 100वें नंबर पर रहा था। पिछले साल इंडिया 119 देशों की सूची में 103 नंबर पर था।

  2. यह पीयर-रिव्यूड वार्षिक रिपोर्ट है, जिसे आयरलैंड की कन्सर्न वर्ल्डवाइड और जर्मनी की वेल्थुंगरहिल्फे ने संयुक्त रूप से प्रकाशित किया। इस रिपोर्ट में बेलारूस, बोस्निया एंड हरजेगोविना और बुल्गारिया क्रमशः पहले, दूसरे और तीसरे नंबर पर हैं। वहीं, आखिर में सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक 117वें और यमन 116वें स्थान पर हैं।

    • कम पोषण
    • पांच साल से कम उम्र के बच्चे, जिनका वज़न उम्र के लिहाज़ से कम है (चाइल्ड वेस्टिंग)
    • पांच साल से कम उम्र के बच्चे, जिनकी ऊंचाई उम्र के लिहाज़ से कम है (चाइल्ड स्टंटिंग)
    • पांच साल से कम आयु में शिशु मृत्यु दर
  3. दोनों अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शोध के जरिएचारों पैमाने पर आकलन के बाद सभी देशों को 0 से 100 तक अंक देती हैं। इसी आधार पर सभी देशों में भुखमरी की स्थिति का अनुमान लगाया जाता है। इस बार रिपोर्ट में भारत को 30.3 अंक मिले, जो भुखमरी की गंभीर स्थिति को दर्शाता है।

  4. इस रिपोर्ट के बाद कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्धारमैया ने केंद्र सरकार पर तंज कसा। उन्होंने ट्वीट किया, ‘‘वैश्विक भूख सूचकांक की रिपोर्ट बताती है कि भारत में भुखमरी की समस्या काफी गंभीर है। फिर भी ज्यादातर लोगों को लगता है कि ‘अच्छे दिन आएंगे’। सवाल है कि कब आएंगे अच्छे दिन? क्या यह तब होगा, जब लोग मरने लगेंगे?’’

  5. वहीं, संयुक्त राष्ट्र ने बच्चों के पोषण पर आधारित एक रिपोर्ट जारी की। इसमें बताया गया है कि दुनिया में 5 साल से कम उम्र के करीब 70 करोड़ बच्चों में एक तिहाई या तो कुपोषित हैं या मोटापे से जूझ रहे हैं। 'स्टेट ऑफ द वर्ल्ड्स चिल्ड्रन' नामक रिपोर्ट के मुताबिक इससे आजीवन बच्चों के बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा है।

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      प्रतीकात्मक फोटो।


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