from NDTV Khabar - Filmy https://ift.tt/38rxMao
via IFTTT
दुनियाभर के एक्सपर्ट सोशल डिस्टेंसिंग के लिए 6 फीट का दायरा मेंटेन करने की सलाह दे रहे हैं लेकिन हालिया शोध के नतीजे चौकाने वाले हैं। भारतीय और अमेरिकी शोधकर्ताओं की टीम का कहना है, कोरोना के कण बिना हवा चले भी 8 से 13 फीट तक कीदूरी तय कर सकते हैं। शोधकर्ताओं के मुताबिक, 50 फीसदी नमी और 29 डिग्री तापमान पर कोरोना के कण भाप बनकर हवा में घुलभी सकते हैं।
यह रिसर्च बेंगलुरू के इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, कनाडा की ऑन्टेरियो यूनिवर्सिटी और कैलिफोर्निया लॉस एंजलिस यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने मिलकर की है। शोधकर्ताओं का लक्ष्य यह पता लगाना था कि वायरस में मौजूद वायरस के कणों का संक्रमण फैलाने में कितना रोल है।टीम का कहना है, रिसर्च के नतीजे स्कूल और ऑफिस में सावधानी बरतने में मदद करेंगे।
मेथेमेटिकल मॉडल से समझी कणों की गति
शोधकर्ताओं के मुताबिक, कोरोना से बचना है तो सिर्फ सोशल डिस्टेंसिंग ही काफी नहीं क्योंकि संक्रमण फैलाने वाले वायरस के कण बिना हवा के 13 फीट तक जा सकते हैं। फिजिक्स ऑफ फ्लुइड जर्नल में प्रकाशित शोध के मुताबिक, टीम में कोरोना के कणों को फैलने, वाष्पित होने और हवा में इनकी गति को समझने के लिए मेथेमेटिकल मॉडल विकसित किया।
एक बार छींकने पर 40 हजार ड्रॉप्लेट्स निकले
शोधकर्ताओं ने संक्रमित और स्वस्थ इंसान के मुंह से निकले ड्रॉप्लेट्स पर रिसर्च की। इनमें कितनी समानता है, इसका पता लगाया गया। रिसर्च में सामने आया एक बार खांसने से 3 हजार ड्रॉप्लेट्स निकले और जो अलग-अलग दिशा में बिखर गए। वहीं, एक बार छींकने पर 40 हजार ड्रॉप्लेट्स निकले।
हवा चलने पर हालात और बिगड़ सकते हैं
टोरंटो यूनिवर्सिटी के शोधकर्ता डॉ. श्वेतप्रोवो चौधरी के मुताबिक, ऐसी स्थिति में अगर हवा चलती है या दबाव बनता है तो हालात और बिगड़ सकते हैं। फैलने वाले ड्रॉप्लेट्स का आकार 18 से 50 माइक्रॉन के बीच होता है, जो इंसान के बालों से भी बेहद बारीक होता है। इसलिए यह बात भी साबित होती है कि मास्क से संक्रमण को रोका जा सकता है।
नमीमें अधिक सेंसेटिव हो जाते हैं वायरस कण
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस, बेंगलुरू के शोधकर्ता डॉ. सप्तऋषि बसु के मुताबिक, रिसर्च का यह मॉडल शत-प्रतिशत यह साबित नहीं करता है कि कोरोना ऐसे फैलता है लेकिन अध्ययन के दौरान यह सामने आया है कि ड्रॉप्लेट्स वाष्पित भी हो सकते हैं और नमीं होने की स्थिति में अधिक सेंसेटिव हो जाते हैं।
पिछले कुछ महीनों के दौरान कोरोना से जंग जीतने में देश के डॉक्टर्स द्वारा दिए गए योगदान को हमेशा याद किया जाएगा। सालों से कई महिला डॉक्टर अपने काम से महिलाओं की दशा सुधार रही हैं। इनके खास योगदान के लिए भारत सरकार ने इन्हें कई पुरुस्कारों से सम्मानित भी किया है। डॉक्टर्स डे पर हम बात कर कर रहे हैं भारत की पांच डॉक्टर्स के बारे में जिन्होंने अपनी मेहनत से मेडिकल क्षेत्र में खास मुकाम हासिल किया।

डॉ. तरू जिंदल
पिता भाभा ऑटोमिक रिसर्च सेण्टर में वैज्ञानिक थे. 2013 में उन्होंने मुंबई में जाने माने लोकमान्य तिलक मेडिकल कॉलेज और सायन हॉस्पिटल से ऑब्सटेरिक्स और गाइनेयोकोलोजी में MD की डिग्री ली. MD के बाद इनके पास बड़े कॉर्पोरेट अस्पतालों में नौकरी के विकल्प थे लेकिन डॉ. तरु जिंदल ने “केयर इंडिया” और “डॉक्टर्स फॉर यू” के जरिये बिहार की स्वास्थ्य सेवाओं में सुधारे लाने के लिए मोतिहारी, चम्पारण आने का निर्णय लिया. 2017 में मोतिहारी जिला अस्पताल को भारत सरकार द्वारा ‘कायाकल्प अवार्ड‘ से सम्मानित किया गया। तरू ने बिहार के मसारी में भी हेल्थ केयर सेंटर की शुरूआत की लेकिन ब्रेन ट्यूमर होने की वजह से वे इस अस्पताल में अपना अधिक समय नहीं दे सकीं। उन्होंने एक किताब भी लिखी है। इसका नाम ए डॉक्टर्स एक्सपेरिमेंट इन बिहार है।

डॉ. लीला जोशी
डॉक्टर लीला जोशी ने अपने करियर के शुरूआती दिनों में असम में काम किया था। वहीं उनकी मुलाकात मदर टेरेसा से हुई। मदर टेरेसा से प्रभावित होकर रिटायरमेंट के बाद लीला ने मध्यप्रदेश की आदिवासी महिलाओं के स्वास्थ्य के लिए काम किया। डॉक्टर लीला आदिवासी अंचलों में जाकर वहां की महिलाओं का निशुल्क इलाज करती हैं। डॉ. जोशी पिछले 22 सालों से इस कार्य में लगी हुईं है और 82 साल की उम्र में भी उनके जोश में कोई कमी नहीं आई है। स्त्री रोग विशेषज्ञ डॉ लीला जोशी ने आयरन की कमी से जूझती आदिवासी महिलाओं को सेहतमंद बनाने के लिए कैंप लगाए और मुफ्त इलाज किया। इसी उपलब्धियों के कारण भारत सरकार ने 82 वर्षीय लीला जोशी पद्मश्री देने की घोषणा की है।

डॉ.पद्मावती बंदोपाध्याय
डॉ.पद्मावती बंदोपाध्याय ने उस समय सेना की डगर पर पांव रखा, जब लड़कियों को घर से निकलने की भी आजादी नहीं थी। उन्होंने वायु सेना में तैनाती के दौरान भारत-पाक के बीच हुए 1971 के युद्ध और कारगिल युद्ध में भी हिस्सा लिया।उन्हें विशिष्ट सेवा पदक, अति विशिष्ट सेवा पदक और राष्ट्रपति से सम्मान पदक सहित देश दुनिया में करीब एक दर्जन से ज्यादा सम्मान मिल चुके हैं। हाल ही में लिम्का बुक ऑफ रिकॉर्ड ने वर्ष 2014 के लिए वुमेन ऑफ द ईयर चुना है। पद्यमावती और उनके पति, दुनिया के पहले ऐसे दंपती हैं, जिन्हें विशिष्ट सेवा पदक एक ही दिन एक साथ मिला था।

डॉ. इंदिरा हिंदुजा
इससे पहले उन्होंने 6 अगस्त 1986 को केईएम अस्पताल में भारत के पहले टेस्ट ट्यूब बेबी का जन्म करा कर इतिहास रच दिया था। डॉ. इंदिरा हिंदुजा का परिवार मूल रूप से पाकिस्तान के शिकारपुर का रहने वाला था। उनका जन्म स्वतंत्रता प्राप्ति के पहले हुआ था और विभाजन के बाद वह परिवार के साथ भारत आ गयी थीं। उन्होंने अपनी शिक्षा-दीक्षा मुंबई में ही की। बॉम्बे यूनिवर्सिटी से स्त्री रोग विज्ञान में एमडी की डिग्री हासिल करने के बाद उन्होंने अपना पूरा जीवन लोगों की सेवा में लगा दिया। उन्होंने बॉम्बे युनिवर्सिटी से ह्युमन इन वर्टियो फर्टिलाइजेशन व एंब्रियो ट्रांसफर में पीएचडी की डिग्री हासिल की। 15 जुलाई, 1991 को उन्हें मुंबई के सार्वाधिक प्रतिष्ठित माने जाने वाले जसलोक अस्पताल में ऑनरेरी ऑब्सटेट्रीशियन एंड गायनेकोलॉजिस्ट बनाया गया और वे अब तक वहां से जुड़ी हैं। कुछ ही वर्षों में बेहद सम्मानित ब्रीच कैंडी अस्पताल और हिंदुजा अस्पताल में भी उन्हें मानद प्रसूति व स्त्रीरोग विशेषज्ञ का ओहदा मिल गया। वर्ष 2011 में उन्हें भारत सरकार द्वार दिये जाने वाले तीसरे सबसे बड़े पद्म अवॉर्ड पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। इसके अलावा उन्हें वर्ष 2000 में धनवंतरी अवॉर्ड, इंटरनैशनल वूमेन्स डे अवॉर्ड , वर्ष 1999 में लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड, वर्ष 1987 में आउटस्टैंडिंग लेडी ऑफ महाराष्ट्र स्टेट जेसी अवॉर्ड और यंग इंडियन अवॉर्ड भी मिल चुके हैं।

डॉ. शांति रॉय
बिहार के सीवन गांव तक चिकित्सा सेवाएं पहुंचाने में डॉ. शांति रॉय का खास योगदान हैं। गायनेकोलॉजिस्ट और ऑब्सटट्रिशियन शांति को पद्मश्री सम्मान प्राप्त है। उन्होंने महिलाओं को दी जाने वाली मेडिकल सेवाओं को विकसित किया। रिटायर होने के बाद वे पटना मेडिकल कॉलेज में गायनेकोलॉजी विभाग की हेड ऑफ द डिपार्टमेंट हैं। काफी व्यस्त होने के बाद वे आज भी महिलाओं को अपनी सेहत के प्रति जागरूक करती हैं। डॉ. शांति रॉय कहती हैं कि भारत की महिलाएं पति और बच्चों की देखभाल में दिन रात लगी रहती हैं। वे अपने परिवार के लिए रोज अच्छे से अच्छा खाना बनाती हैं। लेकिन जब उनके स्वास्थ्य की बात आती है तो खुद की देखभाल करने में वे सबसे पीछे हैं।
कोरोना कैसे फैला अब तक कोई भी मॉडल इसकी सटीक भविष्यवाणी नहीं कर पाया है। देश को सिर्फ महामारी से बचाव के तरीकों पर फोकस करने की जरूरत है। यह कहना है आईसीएमआर के डायरेक्टर जनरल डॉ. बलराम भार्गव का। डॉ. बलराम के मुताबिक, जांच, वायरस की ट्रैकिंग और इलाज ही महामारी को रोकने का बेसिक बचाव है।
गणितिय मॉडल सिर्फ अलर्ट करते हैं
डॉ. बलराम ने एक इंटरव्यू में कहा, कोई भी गणितिय मॉडल यह नहीं बता सकता कि कोरोना के फैलने के लिए कौन-कौन से फैक्टर जिम्मेदार हैं। ऐसे मॉडल से सिर्फ ये आइडिया दिया जा सकता है कि देश के लिए सबसे अच्छी और बुरी स्थिति क्या हो सकती है ताकि हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने की तैयारी रखी जा सके।
क्या होता है गणितिय मॉडल
गणितिय मॉडल का प्रयोग रिसर्च में किया जाता है। इसकी मदद से शोधकर्ता बताते हैं कि किसी चीज का कितना प्रभाव भविष्य में पड़ सकता है। उसके व्यवहार में कितना बदलाव आ सकता है। ये अनुमान पर आधारित होते हैं। कोरोना के मामले में भी शोधकर्ताओं ने अपनी रिसर्च में अलग-अलग गणितीय मॉडल का प्रयोग किया, लेकिन अब तक कोई भी मॉडल सटीक जानकारी नहीं दे पाया है।
इतने मॉडल फेल हुए
देश में 28 जून को 2000 से अधिक कोविड-19 के नए मामले सामने आए और आंकड़ा 546,771 तक पहुंच गया। रोजाना संक्रमण केबढ़ते मामलों ने कोरोना की भविष्यवाणी करने वाले गणितीय मॉडल को गलत साबित किया है। कई मॉडल ने भविष्यवाणी की थी कि जुलाई कोरोना का पीक सीजन होगा। वहीं, कुछ मॉडल्स के मुताबिक, देश में मई-जून तक मामले थम जाएंगे। इसके अलावा कुछ में यह भी कहा गया था कि भारत में कोरोना का ग्राफ घटेगा। ये सारी भविष्यवाणी फेल साबित हुई हैं।
वायरस कब कैसे बदलेगा, समझना मुश्किल
नेशनल हेल्थ अथॉरिटी और आयुष्मान भारत-प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के चीफ एग्जीक्यूटिव इंदु भूषण के मुताबिक, गणितीय मॉडल हमेशा मौजूद डाटा के आधार पर अनुमान लगाते हैं। महामारी से जुड़े कई ऐसे फैक्टर हैं जो अज्ञात हैं। कोरोनावायरस किसी खास परिस्थिति में कैसे व्यवहार करके, यह पूरी तरह से नहीं समझा जा सकता।
© 2012 Conecting News | Designed by Template Trackers - Published By Gooyaabi Templates
All Rights Strictly Reserved.